कर्म सन्यास योंग
कर्मयोग, सन्यासयोंग, दोनों आपस में पूरक ।
द्वेषहीन, इच्छाविहीन, सुख - दुःख में कभी न हो तो रत ।।
ऐसे ही सन्यासी, जिनका अविरल कर्म स्वभाव ।
अति गतिशील चक्र में लखता, स्थिरता का भाव ।।52॥
परम लक्ष्य में तत्परता से, सदा निरत सन्यासी ।
उसका कर्म अतुल्य महा है, कर्मयोग अभ्यासी ।।
जैसे रवि दिन -रात पथिक, पर कर्म न करते कोई ।
उनका अति उपकार परम, परमार्थ न जग में गोई ।।53॥
सन्यासी का वेश धरे, या घर ग्रहस्थ का योगी ।
ज्ञान कर्म संयास योंग से, पूर्ण गृहस्थ का योगी ।।
धीरे - धीरे ही बनता जायेगा, पूर्ण साधना होगी।
मन का मैल कामना भागे, स्थितप्रज्ञता जागी ।।54॥
मन मंडल में मन बुध्दी चित्त संग, अहंकार की दौड़ ।
त्रिकुटी के आगे दौड़ न होती, ररंकार के ठौर ।।
इच्छाओ को रोक सके स्थायी, मात्र विचार ।
ऐसा नही कभी हो सकता, यह अति बली विकार ।।55॥
ध्यानाभ्यास करे दृढ़ होकर, दृढ़ता करे विचार ।
उर्ध्वगति सूरत की होगी, हित मन मंडल पार ।।
मन लय होगा, इच्छाओ का लय भी होवे तत्क्षण ।
रंरकार का शब्द मिले तो, अनहद होवे रक्षण ।।56॥
संकट में भी पूरी समता, का हो अचल स्वभाव ।
संस्कार, इन्द्रिय - निग्रह हो, तभी बने यह भाव ।।
कठिन परिश्रम युग - युग करिये, ध्यान सतगुरु पाये।
ज्ञान , कर्म, सन्यास, योंग से, जन्म सफल हो जाये ।।57॥
सांख्य की निष्ठा वाले करते, श्रवण मनन स्वाध्याय ।
हो परोक्ष अध्यात्मज्ञान, अनिवार्य सदा स्वाध्याय ।।
कर्म योगियों की खातिर भी, यह सदा रहे अनिवार्य ।
ध्यानयोंग ही पूर्ण बनावे, प्राणायाम है वार्य।।58॥
ध्यानयोंग की उपासना बिन, लँगड़े और अपूर्ण ।
सांख्यनिष्ठ या कर्मनिष्ठ हो, योंग न ही सम्पूर्ण ।।
केवल घोषित कर देने से, सत्य नही बदलेगा ।
यथार्थता नहि मिल पाई तो, मात्र डींग क्या देगा ।।59॥
वाक्य ज्ञान में निपुण मनुज भव पार न पावे कोई ।
बातो की, बाती दिया से, तम निवृत्त नहीं होई ।।
सूरदास तुलसी भी कह गये, कह गये संत अनेक ।
सुनो गुणों सब सत्य की बाते, पथ यथार्थ ही नेक ।।60॥
सांख्ययोंग, सन्यास योंग में, कर्मयोग का संग ।
कुछ ना कुछ तो अवश्य रहेगा, कुछ संग्रह का ढंग ।।
हृदय परम त्यागी सन्यासी, तब कर्तव्य करेगा ।
कर्मयोग में कर्म त्याग का, तब भवतव्य बनेगा ।।61॥
सब कर्मो में बना अकर्मी, फल कर्मो का त्याग ।
ध्यानोपासन साधन करके, ही समत्व तब जागे ।।
ऐसे मुनि को मोक्ष मिलेगा, होता नही विलम्ब ।
मन तन वचन अलिप्त बनेगा, तत्व ज्ञान अवलम्ब ।।62॥
जैसे जल कमल रहे, जग पाप नही लगता है ।
आत्म शुद्धि हित साधन कर, ब्रह्मार्पणं कर देता है ।।
समतावान कर्मफल त्यागी, परम शान्ति है पाता ।
और अयोगी बंधन में रह, मुक्त नही हो पाता ।। 63॥
नौ छिद्रों की तन नगरी में, संयम करे अकर्मी ।
रहे कर्मरत, राग न फल में, कर्मयोग का धर्मी ।।
आत्मज्ञान में पूर्ण बने, वह महा ब्रम्ह सुख भोगी ।
मन को वश कर, इन्द्रिय सुख से ऊपर उठता योगी ।। 64
इन्द्रिय सुख के बाह्य - भोग में, लिप्त बने क्यों योगी ।
परमानन्द परम सुख पाकर, पावे क्यों सुख - रोगी ।।
केवल बुद्धि शक्ति से यह, निर्लिप्त दशा नहि सम्भव ।
पूर्ण रूप अज्ञान नष्ट हो, आत्मज्ञान से सम्भव ।।65॥
आत्मतेज के सूर्यज्ञान से, प्रभु दर्शन होता है ।
आत्मा से ही परमात्मा का, ज्ञान सुलभ होता है ।।
ऐसे प्रभु का दर्शन कर, सब पाप नष्ट हो जाते ।
तन्मय हो परमात्म परायण, मुक्त दशा को पाते ।।66॥
समदर्शी वह बन जाता है जग, जग के व्यवहार ।
उंच नीच सबमें समता पा, विजय करे संसार ॥
उसका जीवन निष्कलंक ब्रह्ममय, ब्रह्म में ही लीन ।
या अक्षय आनन्द, जगत् में कभी बने मलीन ।। 67 ।।
विषयों की आसक्ति न कराये, सुख दुःख का संसार ।
अन्तर में ही पा जाता है, विपुल ज्ञान भण्डार ॥
आदि अन्त है विषय भोग का, चतुर नहीं रत होता।
पाता है निर्वाण ब्रह्म, वह जीवित मुक्त हो जाता ॥ 68॥
सत्य अहिंसा ब्रह्मचर्य, अस्तेय और अपरिग्रह।
यम के पाँच अंग है ये, बतलाते योगी साग्रह ॥
शौच और सन्तोष तपस्या ईश-भक्ति स्वाध्याय ।
ये हैं पाँच नियम कहलोत विज्ञ सभी बतलाये ॥ 69॥
यम अरु नियम का पालन हो, और विषय भोग से भागे।
भौहौं मध्य दृष्टि कर, स्थिर प्राणवायू को साधें।।
प्राणायाम को गति सम करके, इंद्रिय मन बुद्धि वश हो।
ईच्छा अरु भय क्रोध रहित हो, साधन हो सर्वश हो ।।70॥
ऐसा मननशील मुनि हरदम, मुक्त बना रहता है।
रहता यज्ञ तपस्या भोगी, सबका हित करता है।।
सब लोकों में महाप्रभु - परमात्म, की कर पहचान।
परम शान्ति को प्राप्त कर, वह योगी विज्ञ महान् ॥ 71॥
कतिपय साधक पूरक - कुंभक के साधन को साधें।
प्राण अपान वायु सम करने, ध्यान क्रिया को साधें।
किन्तु निरापद नहीं क्रिया यह, क्यों खतरा ले मोल।
दृष्टि रखे मौहों के मध्य में दृष्टियोग अनमोल ॥ 72॥
इससे भी निरुद्ध होता है , प्राणों का स्पन्दन ।
यही निरापद साधन है, अति सुलभ युक्ति सम्पादन ॥
युक्ति न जाने इसमें भी भी तो, नयन वक्र हो जाये ।
दृष्टि नहीं नयनों का गोला, बस सतर्क हो जाये ॥73॥
एक विन्दुता मन दृष्टि की, चित्त को वृति समेटे।
चेतन सुरत ऊर्ध्वगति होवे, अरु समत्व सब प्रगेट ।।
स्थित प्रज्ञता, सांख्यज्ञान, और कर्मयोग हो पूर्ण ।
आत्म दरश हो ब्रह्म दरश हो, अवलम्बित सम्पूर्ण ॥ 74॥
आकर्षण का केन्द्र कृष्णा है, आकर्षण ही राधा।
आकर्षण है परम ब्रह्म में, जीव है राधा आधा। ॥
आधा जब मिल जाय पूर्ण से, खत्म हुई सबब बाधा।
पारस ब्रह्म दरश परसन से बने न सोना आथा ॥ 75॥
हुआ समाप्त पंचम अध्याय।
प्रभुवर हरदम रहे सहाय।।
गुरुवर हरदम रहे सहाय ।।।




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