अध्याय-७
ज्ञान विज्ञान-योग
परमात्मा हैं नित्य और अविनाशी मायातीत।
पृथ्वी बायु अग्नि जल नभ, मन बुद्धि अहं परतीति ॥
अपरा प्रकृति कहाती उनकी,परा प्रकृति है चेतन ।
इन दोनों से पैदा होते, सब प्राणी जड़ चेतन ॥136॥
सभी सृष्टि उत्पन्न व लय हो, परम प्रभू के कारण ।
संरचना सब गुथी हुई है, उनसे सदा अकारण ॥
जल में रस भी परम प्रभू हैं, रवि चन्द्र अग्नि में तेज।
पृथ्वी के सब गन्ध वही हैं, प्राणिमात्र के जीवन ।
तपस्वी के तप प्रमुवर हैं, बुद्धि, तेज, बल, जीवन ।
धर्मा चरण भी प्रभुवर ही हैं, उपजे त्रिगुण स्वभाव।
अवलम्बित सब ही प्रभुवर हैं, निरावलम्ब प्रभु भाव ॥138॥
मोहित रहते त्रिगुण भाव में, सब संसारी लोग।
पहचानें अविनाशी प्रभु को, ऐसा बने न जोग।
सतरज तम वाली माया की, तरना है अति दुष्कर।
जो प्रभुवर की शरण गहें तो, जोवन होता सुखकर ॥139॥
प्रभुवर की जो शरण न लें तो, बने असुर का भाव।
मूढ़ अधम का दुराचार से, छीजै ज्ञान प्रभाव ॥
ज्ञानी, जिज्ञासु, आरत हों, और भक्त अथीर्थी।
इनमें ज्ञानो भक्त श्रेष्ठ हैं, सदाचार परमार्थी ॥140॥
सभी भक्त उत्तम होते हैं, ज्ञानी सबसे प्रिय हैं।
वे प्रभुवर के आत्मरूप हो। प्रभु ही सबसे प्रिय हों ।
जनम जनम का ज्ञान हो संग्रह, तब वह प्रभु को पाता।
ज्ञानी दुर्लभ ऐसा, जो, सब कुछ प्रमुमय हो पाता ॥141॥
जिनकी बुद्धि हरे कामना, देव शरण है जाता।
अल्पबुद्धि होने से वह तो, नाशवान् फल पाता ॥
देव भूत पूजन अर्चन से, उसी लोक में जावे ।
प्रभूवर के पूजने से अनाशी शान्ति पर सुख पावे ॥142॥
प्रभु का परम स्वरुप अनाशी, इन्द्रिय गम्य नाहिं भ्राता।
इन्द्रिय गम्य जो जाने, जानो, दिये न बुद्धि विधाता ॥
योग की माया में छिप रहते प्रभुवर प्रगट न रहते।
मूढ़, अजन्मा अविनाशी प्रभु की पहचान न लहते ॥143॥
सबमें हैं वह परमप्रभू, यह तो है “ज्ञान” की बातें।
प्रभुमय है सब स्वर्ण सरिस, इसको "विज्ञान” बताते ॥
प्रभूवर को नहिं आना-जाना, सर्वरुप सर्वत्र ।
वासुदेव से प्रगटे थे, अव्यक्त सवा सर्वत्र ॥144॥
प्रभुबर को धर ज्योति धरें वे, रविवर जैसा भाव।
आँख ठहर पाती नहिं उनपर, घटे न कोटि प्रमाव ॥
जगत सुमंगलकारी आभा, माँ देवकी ने पाया।
जैसे पूरब दिशि शशि प्रगटे, प्रगटे सुधट जो पाया ॥145।।
जग का जिनमें वास प्रभु वो वास गर्भ देवकी के।
कारा में शोभा न प्रकाशी, बन्ददीप घट घी के।।
निशितम था घनघोर घिरा, प्रभु देवकी गर्भे से प्रगटे ।
भगवन् विष्णु जनार्दन जन्मे, कंस के कारा प्रगटे ॥146॥
जैसे काँट से कांट निकालें, यादव-तन भू भार हटाये।
कंटक भार हटा कर तन से, तन कंटक भी पार हटाये ॥ ।।
नर तन त्याग किया जब,प्रमु ने, आप्त जनों ने दाह कराया।
लौकिक ढंग से जो तन पाया, लौकिकता से पार लगाया ।। 147॥
लौकिक तन अज अव्यय कैसे, इन्द्रियातीत हो कैसे ।
उस तन में व्यापक प्रभु अव्यय, तब प्रतीति है ऐसे ।।
लीलाधाम पात्र तन सबकुछ, क्षेत्र देहधारी के ।
है क्षेत्रज्ञ स्वरुप आत्मा, प्रभुवर तनधारी के ॥148॥
भगवन् कृष्णा अन्म के पहले, पापचार बढ़ा था।
कंटकमय शिष्टों का जीवन, पृथ्वीभार बढ़ा था।
इस कंटक को दूर करन हित, यादव तन में आये।
इस कंटक को दूर किया फिर, कंटक तन बिसराये ॥ 149॥
इन्द्रियगोचर दृष्टिपरक था, यह यादव तन, प्रभु का।
वासुदेव देवकी के सुत थे, कृष्णा नाम था सुत का।
नर-तन प्रकृत लिया जब प्रभु ने, तब जन जन ने जाना।
गर्भ में रहना, बालक लोला, प्रकृत रूप पहिचाना ॥150॥
प्राकृत तन जब कृष्णा तजे, तब अर्जुन दाह कराये ।
दाह नहीं हो दिव्य देह का का, सत्य मात्र अपनायें ॥
टीकाकार दिव्य तन लिख दें, व्यासदेव नहिं गाये ।
बुद्धिहीन जन इंद्रिन से लख, अनुपम रुप न पाये।।151॥
क्षेत्र अलग, क्षेत्रज्ञ अलग है, यह गीता का ज्ञान ।
समी क्षेत्र क्षेत्रज्ञ प्रभू हैं, नाहिं अभेद हैं ज्ञान।
सबके अन्दर प्रभू व्याप्त हैं, आत्म तत्व है प्राण।
तन से अलग आत्म-प्रभु जाने ,परखे पुरुष महान् ॥१५२॥
हुआ समाप्त सप्तम अध्याय ।
प्रभुवर हरदम रहे सहाय ॥
गुरुवर हरदम रहें सहाय ॥।
No comments:
Post a Comment